Wednesday, November 18, 2009

कविताओं का काम,

कवि सम्मेलन के बाद जब मैं घर आया
तो अपनी पत्नी पर यूं रौब जमाया-
‘आज तो मैंने सारा
कवि सम्मेलन लूट ही लिया
मेरी कविता ने जनता जगा दी
समझ ले कि वहाँ पर आग-सी लगा दी....।
’खीझ कर पत्नी मुझ से बोली—
‘इसमें हे प्राण-पीया
नाम क्या कर दिया ?
हमारी शादी में भी
आपने कमाल कर दिया था
मुंह-मांगा दहेज लेकर
मेरे घर वालों को लूट ही तो लिया था
जाम पर जाम भर रहे हो

बेच-बेच मेरे आभूषण मेरी
लुटाई नहीं तो क्या कर रहे हो ?

रही बात आग लगाने की
तो सच-सच बताती हूँ

मैं आपकी ही कविताओं से
रोज अँगीठी सुलगाती हूँ...।’