Friday, June 20, 2008

इन्सानी कुत्ते

कोर्ट में एक पेचीदा मुक़दमा आया
एक सिपाही एक कुत्ते को बांधैं लाया

सिपाही ने जब कटघरे में आ कुत्ते को खोला
कुत्ता रहा चुपचाप, मुंह से कुछ नही बोला

नुकिले दाँदां में कुछ खून-सा नज़र आ रहा था
चुपचाप था कुत्ता, किसी से नजर नही मिला रहा था

हुआ खड़ा एक वकील
देने लगा दलील

बोला, ये ज़ालिम पेचीदा है
जज सॉब ये कुत्ता है

इसने जो साख कमाई है
देख कै इन्सानियत घबराई है

क्रुर है, निर्दयी है, इसने बहुत तबाही मचाई है
दो दिन पहले जन्मी एक कन्या, अपने दांतों से खाई है

अब कतई ना देखो बाट
उतारो इसको मौत के घाट
जज का गया खून खोल
तू क्यूँ खाई कन्या अबे बोल

हुक्म आप इसे जिंदा रहने मत दो
कुत्ते का वकील बोला, इसे भी कुछ कहने तो दो

तब कुत्ते ने अपना मुँह खोला
बड़े ही सहज सुर मैं वो बोला

हाँ, मैंने वो कन्या खाई है
अपनी कुत्तानियत निभाई है

कुत्ते का धर्म है नही दया दिखाना
माँस चाहे किसी-का हो, बस खा जाना

पर मैं दया-धर्म से दूर नही
खाया तो है, पर मेरा कसूर नही

मुझे पता है, जब वो बच्ची गई फैकाई
और कोई नही, उसकी माँ ही उसे फेंकने आई

जब मैं उस कन्या के गया पास
उसकी आंखो मैं देखा भोला विश्वास

जब वो मेरी जीभ देख कै मुस्काई थी
कुत्ता हूँ, पर उसने मेरे अन्दर इन्सानियत जगाई थी

मैंने सूंघ- कर बड़ी मुश्किल से वो घर खोजा था
जहाँ थी माँ उसकी, और बालक भी सोया था

मैंने कू-कू करकै वो माँ जगाई
पूछा तुने वो, कन्या क्यों फैकाई

चल, मेरे पीछे, उसे लै कै आ
भूखी है वो, उसे अपना दूध पिला
माँ सुनते ही रोने लगी
अपने दुखडे धोने लगी

बोली, नही लाऊँगी अपने कलेजे के टुकड़े को
कैसे कर खोल बताऊँ अपने मन के दुखड़ै को

मेरे घर पहले ही चार छोरीयाँ है
दो को बुखार है, और दो चटाई पै सो रई है

मेरी सास मारै है ताना की मार
मुझे पीटने आता मेरा भरतार

बोला, फिर छोरी ले आई
कैसे होगी इनकी ब्याह सगाई

वंश की तुने काट दी बेल
जा खत्म कर दे इसका खेल

माँ हूँ, पर थी मेरी लाचारी
तब फैंक आई, छोरी प्यारी

कुत्ते का गला भर गया
पर ब्यान वो पुरा कर गया

बोला, मैं फिर वापस आ गया
दिमाग मैं मेरे धुंआ सा छा गया
वो कन्या अंगूठा चूस रही थी
हँसी ऐसे जैसे मेरे इन्तजार में जाग रही थी

कलेजे पै धर लिया मैंने पात्थर
थर-थर काँपने लगा मेरा ज़ॉथर

बोला, ऐ बावली, जी कै, क्या करेगी
दूध नही, जहर है, पी कै, क्या करेगी

हम कुत्तो को करते है बदनाम
हम से ज्यादा घिनौने करते है काम

कब ज़िन्दी अरक दे पेट मैं मरवाते है
और अपने आप को इन्सान बताते है

मेरे मन मैं भय कर गई उसकी मुस्कान
मैंने आज इतना तो लिया जान

जो समाज इस-से नफरत करता है
कन्या हत्या-सी गन्दी हरकत करता है

वहाँ-से तो इसका जाना अच्छा
इसका तो मर जाना अच्छा

तुम लटकाओ मुझे फांसी, चाहे मारो जूत्ते
पर ढूढ कै लाओ पहले वो इन्सानी कुत्ते
पर ढूढ कै लाओ पहले वो इन्सानी कुत्ते

किसका दोष

दो बुँदे सावन की.........
इक सागर के पेट मै तपके और मोती बन जाए
दूजी गंदे जल मै गिर कर अपना आप गवाए
किसको मुजरिम समझे कोई किसका दोष लगाए

दो कलियाँ गुलशन की..........
इक सहरे के बिच गुंथे और मन ही मन इतराए
इक अर्थी की भेंट चढ़े और धूलि मै मिल जाए
किसको मुजरिम समझे कोई किसका दोष लगाए

दो सखियाँ बचपन की..........
इक सिंघासन पर बैठे और रूपमती कहलाये
दूजी अपने रूप के कारण गलियों मै बिक जाए
किसको मुजरिम समझे कोई किसका दोष लगाए

Friday, June 13, 2008

कसुतो कुत्तो....

कोर्ट में एक कसुतो मुकदमो अयो
एक सिपाही एक कुत्ते नै बांधैं ल्यायो

सिपाही जद कटघरे में आ कुत्ते ने खोल्यो
कुत्तो रहग्यो चुपचाप, मुंडे-उ कि-नई बोल्यो

नुकिले दाँदां में कीं खून-सो नज़र आवै हो
चुपचाप हो कुत्तो, किसुं नजर नई मिलावै हो

होयो खडो एक वकील
देण लाग्या दलील

बोल्यो, ओ ज़ालिम कसुतो है
जज सॉब ओ कुत्तो है

ई जकि करणी कमाई है
देख कै इन्सानियत घबराई है

क्रुर है, निर्दयी है, ई घणी तबाही मचाई है
दो दिन पहल्या जन्मी एक छोरी, आपणे दाँदां ऊं खाई है

अब कतई ना देखो बाट
उतारो ई नै मौत रे घाट
जज को गयो खून खोळ
तू क्यूँ खाई कन्या अबे बोल

हुक्म थै इनै जिन्दो रहण मत दयो
कुत्ते रो वकील बोल्यो, ई नै भी कुछ कहण तो दयो

जणे कुत्तो आपरो मुँह खोल्यो
बड़ी सहज सुर मैं वो बोल्यो

हाँ, मैं वा कन्या खाई है
अपणी कुत्तानियत निभाई है

कुत्ते को धर्म है नही दया दिखाणो
माँस चाहे किरो-ही हो, बस खा ज्याणो

पर मैं दया-धर्म सूं दूर नही
खायो तो है, पण म्हारो कसूर नही

मन्नै पतों है, जद वा छोरी गई बगाई
और कोई नही, बिरी माँ ही बिने फैंकण आई

जद मैं उण कन्या रे गियो पास
बिरी आँख्यां मैं देख्यो भोलो विश्वास

जद वा म्हारी जीभ देख कै मुस्काई ही
कुत्तो हूँ, पण बिण म्हारे अन्दर इन्सानियत जगाई ही

मैं सूंघ-सूंघ बड़ी मुश्किल वो घर जोयो हो
जठे ही माँ बिण-री, अर बाबू भी सोयो हो

मैं कू-कू करकै वा माँ जगाई
पुछ्यो थुं वा, कन्या क्याँ बगाई

चॉल, म्हारे लारे, बिने लै कै आ
भूखी है वा, बिने थारो दूध पिला
माँ सुणताँ ही रोण लागगी
अपारो दुखड़े धोण लागगी

बोली, कोनी लाऊँ अपणै कॉलजे रे टुकड़े नै
कियां कर खोल बताऊँ म्हारे मन रे दुखड़ै नै

म्हारे घरे पहल्याँ ही चार छोरयाँ है
दो नै बुखार है, अर दो चटाई पै सो री है

म्हारी सासू मारै है ताना री मार
मन्नै पीटण आवे म्हारो भरतार

बोल्यो, फेर छोरी ले आई
कियां हुवेला इयांरी ब्याह सगाई

वंश की तूं काट दी बेल
जा खत्म कर दे इणरो खेल

माँ हूँ, पण ही म्हारी लाचारी
जणे फैंक आई, छोरी प्यारी

कुत्ते रो गलो भरग्यो
पर ब्यान वो पुरो करग्यो

बोल्यो, मैं पछे पाछो आग्या
दिमाग मैं म्हारे धुंओ सो छाग्यो
वा छोरी अन्गुठो चूसण लाग री
हाँसी इयाँ जाणे म्हारे बाट में जाग री

कॉलजै पै धर लिया मैं पात्थर
थर-थर कंपयो म्हारो ज़ॉथर

बोल्यो, ऐ बावली, जी कै, काई करेली
दूध नही, जहर है, पी कै, काई करेली

म्हाँ कुत्तां नै करे है बदनाम
म्हारै सूं ज्यादा घिनौना करैं है काम

कदे ज़िन्दी अरक दे पेट मैं मरवावै है
अर आपणै आप नैं इन्सान बतावै है

म्हारे मन मैं भय करगी बिरी मुस्कान
मैं आज इत्तो तो लियो ज़ॉण

जको समाज इण-सूं नफरत करै है
कन्या हत्या-सी गन्दी हरकत करै है

बठे-उ तो इरो ज्याणो चोखो
इरो तो मर ज्याणो चोखो

थे लटकाओ मन्नै फांसी, चाहे मारो जूत्ते
पण ढूढ कै ल्याओ पहल्याँ वे इन्सानी कुत्ते
पण ढूढ कै ल्याओ पहल्याँ वे इन्सानी कुत्ते