दो बुँदे सावन की.........
इक सागर के पेट मै तपके और मोती बन जाए
दूजी गंदे जल मै गिर कर अपना आप गवाए
किसको मुजरिम समझे कोई किसका दोष लगाए
दो कलियाँ गुलशन की..........
इक सहरे के बिच गुंथे और मन ही मन इतराए
इक अर्थी की भेंट चढ़े और धूलि मै मिल जाए
किसको मुजरिम समझे कोई किसका दोष लगाए
दो सखियाँ बचपन की..........
इक सिंघासन पर बैठे और रूपमती कहलाये
दूजी अपने रूप के कारण गलियों मै बिक जाए
किसको मुजरिम समझे कोई किसका दोष लगाए
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