Wednesday, September 23, 2009

दर्द की कतरन-3

उजले मोती हमने मांगे थे किसी से थाल भर,
और उसने दे दिए आंसू हमें रुमाल भर’!

अँधियारा जिससे शरमाए उजियारा जिसको ललचाए,
ऐसा दे दो दर्द मुझे तुम मेरा गीत दिया बन जाए।

मैंने तो चाहा बहुत कि अपने घर में रहूँ अकेला पर,

सुख ने दरवाजा बन्द किया, दुख ने दरवाजा खोल दिया।

ऐसी घनी उदासियाँ बहते जिगर के छाले,
किस जुर्म की सजा में दिल दर्द के हवाले।

अभी अभी उसने बतलाया दर्द कई हैं भारी-भारी,
रोटी और पेट का रिश्ता दिल का और नजर का रिश्ता।

सहते सहते गम से यारी हो गयी,
सारी दुनिया ही हमारी हो गई।

तेरे मैखाने सरेआम से खाली खाली,
सुरूर और ही उस कुदरती शराब का है।

दिल दर्द सुना करता दिल दर्द कहा करता,
अहसास का समुन्दर चुपचाप बहा करता।

करिश्मा है सबसे अच्छा आदमी का खिलखिलाना,
यह बहाना वह बहाना मौत का भी क्या ठिकाना।

रुक गई थी थोड़ा सुस्ताने अभी,
फिर चलेगी दर्द की बारात। ........

जरा सी बात...

ज़रा-सी बात है लेकिन हवा को कौन समझाये,
दिये से मेरी माँ मेरे लिए काजल बनाती है।

सर से गुज़रा भी चला जाता है पानी की तरह,
जानता भी है कि बर्दाश्त की हद होती है!

मुझको उस वैद्य की विद्या पे तरस आता है,
भूखे लोगों को जो सेहत की दवा देता है।

मौत से बदतर बुढ़ापा आएगा,
जान से अच्छी जवानी जाएगी।

‘‘मैं तो तेरे पूजन को आया था तेरे द्वार,
तू ही मिला न मुझे वहाँ मिल गया खड़ा संसार!’’

आदमी होना हँसी मजाक नहीं,
और कुछ इससे दर्दनाक नहीं।

जोश और जोखिम किए जब जिन्दगी के नाम,
तूफानी लहरें भी कर गयीं झुक कर सलाम।

जारी है

फर्जी सेना नकली सैनिक और लड़ाई जारी है,
चोरी और ऊपर से सीनाजोरी की चढाई जारी है।

देखो-देखो कितनी मोहक नीति बनाई राजा ने,
भोगविलास और अय्याशी की अगुआई जारी है।

विद्वानों की सभा सजी है मोटे ग्रंथ विचारों के,
सच का कुछ अनुमान नहीं है कलम घिसाई जारी है।

मानवहित पर बहस चल रही संसद पखवाड़े से,
और सदन में मारामारी-हाथापाई जारी है।

मंत्र नहीं जाने बिच्छू का हाँथ साँप के बिल में दे,
जहर उगलती राजनीति की क्या कुटिलाई जारी है।

लड्डू खाकर जनता खुश है राजा खुश है सत्ता से,
घूँस दलाली वाली रबड़ी और मलाई जारी है।

फैसला लिखने वाले डाकू की निगरानी में,
मौत किसी की भी लिखवा लो सुलह सफाई जारी है।

गधा पंजीरी खाए जमकर बैलों के दरबार सजे,
भूखी तड़फे गाय बेचारी घास चराई जारी है।

कुर्सी नहीं बपौती लेकिन कितनी अच्छी लगती है,
छँटे हुए मक्कारों वाली टाँग खिंचाई जारी है।

Tuesday, September 22, 2009

अलविदा! सलाम!

अलविदा!
मेरे देश की महान गौरवशाली परंपरा
सुख-समृद्धि
मान-सम्मान
नैतिकता-सच्चाई
प्यार-सौहार्द्र-ईमानदारी
अलविदा!

अलविदा बुद्ध
अलविदा कबीर
अलविदा गांधी

अलविदा साहस
अलविदा शौर्य
अलविदा देशभक्ति
अलविदा बन्धुत्व
अलविदा!

बढ़ती आबादी
बढ़ती बेरोजगारी
भूख-विपन्नता महामारी
सलाम!

भ्रष्टाचार-पतनशीलता
लूट बलात्कार
दंगे-मारकाट
अन्याय-अनाचार
पाप-दुराचार
भोग-वासना
स्वार्थ की साधना
सलाम!

हे भूमण्डलीकरण
हे डंकन-गेट
हे बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ
हे नव साम्राज्यवाद
हे आतंकवाद
हे परमाणु बम
हे २६/११ ताज
हे अमेरिका, हे ब्रिटेन
हे डालर, हे पाउन्ड
सलाम !

हे दल
दल में दल
दल-दल
हे भ्रष्टतंत्र के छल
हे चोरों की बारात
चारों ओर काली रात
सलाम! ...........
अगर हम अपने दिल को अपना इक चाकर बना लेते!
तो अपनी ज़िदंगी को और भी बेहतर बना लेते !!

हमारा दिल जो नाज़ुक फूल था सबने मसल डाला !
ज़माना कह रहा है दिल को हम पत्थर बना लेते !!

हम इतनी करके मेहनत शहर में फुटपाथ पर सोये !
ये मेहनत गाँव में करते तो अपना घर बना लेते !!

कुछ लोग हैं जो अपने धड़ पर सर नहीं रखते !
अगर झुकना नहीं होता तो वो भी सर बना लेते !!

Thursday, September 17, 2009

आएगी जब भी बात कभी इंसाफ की देखना
कर ना पाओगे अलग, सही गलत को देखना

बातें जो करनी पड़े कभी अपने आप से
ये एक शब्द भी न निकलेगा होंठों से देखना

सच-झूठ को गिनोगे जिस दिन हाथों से अपने
अफसोस हाथ आएगा उंगलियों को देखना

किसका था कसूर और, था कौन जिम्मेदार
सब समझ आ जाएगा, किसी का होकर देखना

आसान सी बातें सभी, बन जाएंगी मुश्किल
मेरी जगह खुद को कभी तुम रखकर देखना
***
सुबह सुबह घूमने जाने वालों
और काम पर जाने वालों में
साफ अन्तर देखने को मिलते हैं ,
यद्यपि दोनो ही
पेट की खातिर निकलते हैं !!

परदे रे भीतर मत झांकी

परदे रे भीतर मत झांकी ढक्कीयोडो भरम उघड ज्यासी
ढक्कीयोडो भरम उघड ज्यासी जीवन मैं गंठां घुल ज्यासी!

थुं जाणे है कितरा देख अठे बैठा वे मुंड मुँडायोड़ा
थुं जाणे है कितरा देख अठे बुगला नर भेष बणायोड़ा
थुं जाणे है कितरा देख अठे मठधारी तिलक लगायोड़ा
बैठा कितरा अबदुत अठे तन माहीं राख रमायोड़ा
तूं भगत री भगती ने मत देख-2 धरम री धज्जियाँ उड़ ज्यासी........... परदे रे भीतर मत झांकी

के पीछे री छाया मैं तूं जाणे छल री माया वै
दस तैरा कैदी सा पंथी तूं जाणे सब उलझाया वै
गाभा मैं सेंग उघाडा वै हर पाँव फिसलता पाया वै
मिन्खां ने दोष कांई अठे वै दैव लुढ़कता आया वै
तूं जम्योडी रंजी मति उडाय-२ पेड़ री जड़ा उखड ज्यासी.............परदे रे भीतर मत झांकी


के भींताँ भीतर सुं खोली है ऊपर तो रंग रचोला है
चोला तो ऊपर का चोला भीतर ले समंद हबोला है
देख्याँ सुं घण पिस्तावेलो की नही पोल का गोला है
सागर की लहरा तो देखी पर भीतर किसने टनटोला है
सोने रो झोल उतर ताँ ही ठाकुर जी पीतल रल ज्यासी..............परदे रे भीतर मत झांकी

धरम री चादर ऊपर ताँण सुता कुण मौजाँ मारे है
कुणी ने नित बिगाड़ी देख कुणारो जीव ठिकाणे है
करे कुण किरतब काली रात बांने के थुं नही जाणे है
हवा मैं खौज मंडे बिणरा पागी तूं पग पीछाणे है
भेद री बाँताँ ने मत खोल पोल रो ढोल बिखर ज्यासी...............परदे रे भीतर मत झांकी
बाल से आल बुढे से विरोद, कुलखण नार से ना हँसियों,
कुदीयो ना कुआ रमियो न जुआ, जोर जवान से न खसियों,
अंधे की प्रीत, गुलाम की संगत ओधर धार में न घुसियो,
अन्न सु लाज, अग्नि सु जोर अजानत नीर में न धुसियो,
कभी रंग चढ़े तो सुन रहबर कुसंगत से दूर सदा रहियो,

पूरब देखा पश्चिम देखा- देखा मूलक राणे का,
तीन जनों का संग ना करना अँधा,लूला, काणे का
वो यारो की महफ़िल,वो मुस्कुराते पल,
दिल से जुदा है अपने वो बिता हुआ कल!
कभी जिंदगी गुजरती थी हंसने हंसाने मैं,
आज वक्त गुजरता है कागज के नोट कमाने मैं!
हंसने वालो से डरते है, छुप छुप कर रो लेते है,
गहरी गहरी सोच मै डुबे दो दिवाने याद आए !

ठंडी सर्द हवा के झोंके, आग लगा कर छोड़ गए,
फूल खिले शाखों पे नये, और दर्द पुराने याद आए !
दिल की लगी है क्या, ये कभी दिल लगाके देख,
आँसू बहाके देख कभी मुस्करा के देख,
परवाना जल रहा है मगर जल रहा है क्यों
ये राज़ जानना है तो खुद को जलाके देख !!
एक बस तुं ही नही मुझसे खफा हो बैठा
मैंने जो संग तराशा वो ख़ुद खुदा हो बैठा,
बाद मरने के मेरी कब्र पे आया वो दोस्त
याद आई मेरे चाहने वाले को दवा मेरे बाद ,

दर्द की कतरन-2

मेरा दर्द मेरा सिर्फ भगवान जानता है
फिर तुझे कैसे कह दूं, तू भगवान तो नहीं ,
माना तू पुजारी है मेरे भगवान का
तू हिस्सा है उसका, पर उस सा नहीं !
***
मुझको भी हंसना पड़ता है
साथ लोगों के चलना पड़ता है ,
मुश्किल और तब बढ़ जाती है
जब ‘खुश हूं मैं’ कहना पड़ता है!
***
शाख में कांटे कितने भी हों
पर छांव कभी चुभती नहीं है,
कोशिश जारी कितनी भी हो
आरी से पानी कटता नहीं है !
***
तिनके को बहाना बनाया है
कभी आँखों में पानी मारकर,
कभी रोने का शोर छुपाया है
नहाते में नलका खोलकर !
***
तारीफ कर रहे हैं सब, मेरी इस जहान में
क्या जानते नहीं हैं वो, अभी मैं नहीं मरा
निभा रहे हैं सब रिवाज जीते जी मेरे
जिंदा दफन करके क्या उनका, दिल नहीं भरा !
***
कतरन ही रहने दो मुझे, बंटा-बंटा ही रहने दो
ऐसा न हो जुड़ने से मैं, कहीं पढ़ने में आ जाऊं ,
मत बिछाओ पलकों को तुम इंतजार में मेरी
ऐसा न हो मैं आंसू बनकर, आंखों में आ जाऊं !
***
ज्यादा लिखा मैंने अगर, तो बनकर किताब रह जाऊंगा
आया नहीं हूं हाथ अब तक, फिर एक बार में आ जाऊंगा,
रख देगा फिर गुलाब कोई सूखने को मुझमें
या बनके मैं संग्रह किसी का, अलमारी में रह जाऊंगा !
***
अपने बारे में कहूंगा तो कईयों का जिक्र हो जाएगा
मानते हो जिनको भला वो भी बुरा हो जाएगा ,
छोड़िये क्या छेड़नी बातें मेरे जहन की
मेरे बयां से मेरा कोई अपना खफा हो जाएगा !....
***

दर्द की कतरन-1

दर्द भी कोई किसी का, लय में कभी उठता है क्या ?
मात्राएं गिनकर कोई गीत कभी लिखता है क्या ?

दर्द पहले आया यहां या पहले व्याकरण आई
ज़ख्म जिसने न गिने हों, वो शब्दों को गिनता है क्या ?

जो लिखते हैं सलीके से, उनको भी मिलता है क्या ?
तारीफ और कुछ तालियों से, दुख कभी मिटता है क्या ?

छोड़िये क्या बात करनी कायदे और कानून की
काग़ज़ों के फूल पर भंवरा कोई मिलता है क्या ?

दिल की बात सीधी ही दिल तक पहुंचनी चाहिए
इनाम और ये नाम कभी, जग में कहीं टिकता है क्या ?

गीत-ग़ज़ल के पारखी कुछ कह कर दम लेंगे
प्यासे के दिल से पूछिए, उसे पानी में दिखता है क्या ? ........

श्राद्ध

पंडों की मंडी मै
पित्रों के नाम पर,
लुटता जजमान
बिना मोल बिना दाम,
सरे आम दण्डित,
वाह रे… पण्डित !!
कैसे गुजर रही है ये पूछता है हर कोई,
कैसे गुजारता हूँ मैं ये पूछता नहीं कोई !