Thursday, September 17, 2009

दर्द की कतरन-2

मेरा दर्द मेरा सिर्फ भगवान जानता है
फिर तुझे कैसे कह दूं, तू भगवान तो नहीं ,
माना तू पुजारी है मेरे भगवान का
तू हिस्सा है उसका, पर उस सा नहीं !
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मुझको भी हंसना पड़ता है
साथ लोगों के चलना पड़ता है ,
मुश्किल और तब बढ़ जाती है
जब ‘खुश हूं मैं’ कहना पड़ता है!
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शाख में कांटे कितने भी हों
पर छांव कभी चुभती नहीं है,
कोशिश जारी कितनी भी हो
आरी से पानी कटता नहीं है !
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तिनके को बहाना बनाया है
कभी आँखों में पानी मारकर,
कभी रोने का शोर छुपाया है
नहाते में नलका खोलकर !
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तारीफ कर रहे हैं सब, मेरी इस जहान में
क्या जानते नहीं हैं वो, अभी मैं नहीं मरा
निभा रहे हैं सब रिवाज जीते जी मेरे
जिंदा दफन करके क्या उनका, दिल नहीं भरा !
***
कतरन ही रहने दो मुझे, बंटा-बंटा ही रहने दो
ऐसा न हो जुड़ने से मैं, कहीं पढ़ने में आ जाऊं ,
मत बिछाओ पलकों को तुम इंतजार में मेरी
ऐसा न हो मैं आंसू बनकर, आंखों में आ जाऊं !
***
ज्यादा लिखा मैंने अगर, तो बनकर किताब रह जाऊंगा
आया नहीं हूं हाथ अब तक, फिर एक बार में आ जाऊंगा,
रख देगा फिर गुलाब कोई सूखने को मुझमें
या बनके मैं संग्रह किसी का, अलमारी में रह जाऊंगा !
***
अपने बारे में कहूंगा तो कईयों का जिक्र हो जाएगा
मानते हो जिनको भला वो भी बुरा हो जाएगा ,
छोड़िये क्या छेड़नी बातें मेरे जहन की
मेरे बयां से मेरा कोई अपना खफा हो जाएगा !....
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