ज़रा-सी बात है लेकिन हवा को कौन समझाये,
दिये से मेरी माँ मेरे लिए काजल बनाती है।
सर से गुज़रा भी चला जाता है पानी की तरह,
जानता भी है कि बर्दाश्त की हद होती है!
मुझको उस वैद्य की विद्या पे तरस आता है,
भूखे लोगों को जो सेहत की दवा देता है।
मौत से बदतर बुढ़ापा आएगा,
जान से अच्छी जवानी जाएगी।
‘‘मैं तो तेरे पूजन को आया था तेरे द्वार,
तू ही मिला न मुझे वहाँ मिल गया खड़ा संसार!’’
आदमी होना हँसी मजाक नहीं,
और कुछ इससे दर्दनाक नहीं।
जोश और जोखिम किए जब जिन्दगी के नाम,
तूफानी लहरें भी कर गयीं झुक कर सलाम।
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