Thursday, September 17, 2009

बाल से आल बुढे से विरोद, कुलखण नार से ना हँसियों,
कुदीयो ना कुआ रमियो न जुआ, जोर जवान से न खसियों,
अंधे की प्रीत, गुलाम की संगत ओधर धार में न घुसियो,
अन्न सु लाज, अग्नि सु जोर अजानत नीर में न धुसियो,
कभी रंग चढ़े तो सुन रहबर कुसंगत से दूर सदा रहियो,

पूरब देखा पश्चिम देखा- देखा मूलक राणे का,
तीन जनों का संग ना करना अँधा,लूला, काणे का

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