परदे रे भीतर मत झांकी ढक्कीयोडो भरम उघड ज्यासी
ढक्कीयोडो भरम उघड ज्यासी जीवन मैं गंठां घुल ज्यासी!
थुं जाणे है कितरा देख अठे बैठा वे मुंड मुँडायोड़ा
थुं जाणे है कितरा देख अठे बुगला नर भेष बणायोड़ा
थुं जाणे है कितरा देख अठे मठधारी तिलक लगायोड़ा
बैठा कितरा अबदुत अठे तन माहीं राख रमायोड़ा
तूं भगत री भगती ने मत देख-2 धरम री धज्जियाँ उड़ ज्यासी........... परदे रे भीतर मत झांकी
के पीछे री छाया मैं तूं जाणे छल री माया वै
दस तैरा कैदी सा पंथी तूं जाणे सब उलझाया वै
गाभा मैं सेंग उघाडा वै हर पाँव फिसलता पाया वै
मिन्खां ने दोष कांई अठे वै दैव लुढ़कता आया वै
तूं जम्योडी रंजी मति उडाय-२ पेड़ री जड़ा उखड ज्यासी.............परदे रे भीतर मत झांकी
के भींताँ भीतर सुं खोली है ऊपर तो रंग रचोला है
चोला तो ऊपर का चोला भीतर ले समंद हबोला है
देख्याँ सुं घण पिस्तावेलो की नही पोल का गोला है
सागर की लहरा तो देखी पर भीतर किसने टनटोला है
सोने रो झोल उतर ताँ ही ठाकुर जी पीतल रल ज्यासी..............परदे रे भीतर मत झांकी
धरम री चादर ऊपर ताँण सुता कुण मौजाँ मारे है
कुणी ने नित बिगाड़ी देख कुणारो जीव ठिकाणे है
करे कुण किरतब काली रात बांने के थुं नही जाणे है
हवा मैं खौज मंडे बिणरा पागी तूं पग पीछाणे है
भेद री बाँताँ ने मत खोल पोल रो ढोल बिखर ज्यासी...............परदे रे भीतर मत झांकी
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