जीवन मैं फल पाने की लिए,श्रम तो करना पड़ता है
ईश्वर सिर्फ लकीरे देता,रंग स्वंय ही भरना पड़ता है!
जो बीच राह मैं बैठ गए,वे बैठे ही रह जाते है
जो लगातार चलते रहते है,वे निश्चय ही मंजिल पाते है!
कर्म तेरे अच्छे है बन्दे, तो भाग्य तेरा दास है
धरा की तो बात ही क्या,कदमो मैं आकाश है!
मेरा मानना है की "जिस कार्य को नौकर, भाई, पुत्र अथवा,पति,पत्नी भी नही कर सकते,उसी कार्य को मित्र निश्चित रूप से कर दिखायेगे!
इसलिए मित्रों का स्थान ऊँचा है!"……..” आनंद सिंह,”
Tuesday, May 20, 2008
ढूंढ रहा हूँ!.....
जो मुमकिन ही नहीं उस बात का क्या जिक्र, फिर भी ढूंढ रहा हूँ मैं............ वेश्या की आँखों मैं लज्जा,नेता की आँखों मैं चरित्र, प्रेम का बन के निगहबान मुझे चाहेगा मिले वो इत्र, और मरकर भी चाहे मित्र को मित्र कहाँ है ऐसा मित्र,
2 comments:
असंभव की तलाश जारी रहे...अच्छी रचना।
***राजीव रंजन प्रसाद
बढ़िया है.
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