Tuesday, May 20, 2008

ढूंढ रहा हूँ!.....

जो मुमकिन ही नहीं उस बात का क्या जिक्र,
फिर भी ढूंढ रहा हूँ मैं............
वेश्या की आँखों मैं लज्जा,नेता की आँखों मैं चरित्र,
प्रेम का बन के निगहबान मुझे चाहेगा मिले वो इत्र,
और मरकर भी चाहे मित्र को मित्र कहाँ है ऐसा मित्र,

2 comments:

राजीव रंजन प्रसाद said...

असंभव की तलाश जारी रहे...अच्छी रचना।

***राजीव रंजन प्रसाद

Udan Tashtari said...

बढ़िया है.