ज्योंही पुराना वर्ष समाप्त हुआ एक अजनबी के दर्शनों का दुर्भाग्य प्राप्त हुआ !
मिलते ही बोला नये वर्ष की बधाई हमने कहा बधाई वो बोला आपको लेने मैं शर्म नहीं आयी !
देखते नहीं नया वर्ष जबभी आता है कुरते मैं एक पेबंध और लग जाता है !
हद होगई भाई साहब …….
अब तो चरित्र की अति हो गई है !
इमानदारी भ्रस्ताचार से गर्भवती हो गई है !
लंगडे हाथियों को पटक रहें है!
अंधों के घर आईने लटक रहें है !!
मैं आँख वाला हूँ मरना चाहता हूँ देश के लिए बलिदान करना चाहता हूँ !......दस रूपये निकालिए.....
हमने कहा आप और किसी की जेब पर डाका पर डाका नहीं डाल सकते !
वो बोला डाल तो दूँ मगर आप की इज्जत का सवाल है और दस रूपये मैं ही जा रही है
इसीलिए भारत मैं क्रांति नहीं आ रही है !
पेसे का नाम सुनते ही कवि से सिन्धी हो गए चन्द्रमा से बिंदी हो गए !
आइना घर भूल आया हूँ अन्यथा आपका असली चहरा दिखा देता !
चूहे तक देश की सम्रधी को खा रहे है मैं आदमी हो कर भी खाना नहीं खा सकता !!
भाई साहब तिरछी नजर से न देखिये....
भूख हर दर्शन का घूँघट उघाड़ देती है !
रोटी सामने हो तो लाजवंती भी कपडे उतार देती है !!
फिर अपन तो पहले से ही नागा साधू है अपनी कुंठा ये है भाई साहब !
भूखे के बलिदान को सम्मान नहीं मिकता है !
खा पी के मरो तो अस्थि कलश निकलता है !!
जिस कौम को मिटने का अहसास नहीं होता !
उस कौम का दुनिया मैं इतिहास नहीं होता !!
हम ने कहा आप ठीक कहते है प्यारे आप शौक से शहीद कहलाना !
मगर अपना स्मारक खुद ही बनाकर जाना !!
गली का पागल कुत्ता १५ अगस्त के दिन जल चढायेगा !
प्लास्टर उतर गया तो कोई चुना लगाने भी नहीं आएगा !!
वो बोला ठीक है भाई साहब.............................
जी तो नहीं चाहता मगर बलिदान करना पड़ता है !
ज्ञानी को हमेशा मूर्ख के लिए मरना पड़ता है !!
एक रात सपने मैं फांसी का फंदा दिखा दूसरे दिन घरवाली ने हमारी आरती उतारी !
तीसरे दिन ठीक थाने के सामने हमने एक मुर्दे को गोली मारी !!
सारी दुनिया को दिखा
मगर जज साहब ने अपने फैसले मैं लिखा.............
चूँकि पुलिस का इतिहास बताता है
कोई कातिल कभी रंगे हाथ पकड मैं नहीं आता है !
क्योंकि कातिल रंगे हाथ पकडा गया है
इसीलिए बाइज्जत बरी किया गया है !!
भाई साहब हमने तंग आकर गंगा मैं छलांग लगाई !
तो पीछे से पण्डे ने टांग पकडली और प्रभाती सुनाई !!
सुबह-सुबह गंगा को प्रदुसित करता है नादान
खाली हाथ कहाँ चला जजमान
फोकट मैं मुक्ति- पायेगा ?
अबे मुर्दे तक को छोडा नहीं जिंदा बचाकर कैसे जायेगा ?
आप ही बताइए भाई साहब बलिदान के पथ पर कैसे आगे बढे !
शूली पर तो शहीदों का कब्जा है अपन जबरदस्ती क्यों चढ़े !!
एक बात पूछूँ भाई साहब जिस सरफिरे सम्राट ने इस शूली का सिलसला चलाया था !
क्या कभी उसको भी अपनी गर्दन का ख्याल आया था !!
कमबख्त ने इतना तो सोच लिया होता !
जुल्म के यदि पाँव होते तो कब का मंजिल पे पहुँच गया होता !!.........
मिलते ही बोला नये वर्ष की बधाई हमने कहा बधाई वो बोला आपको लेने मैं शर्म नहीं आयी !
देखते नहीं नया वर्ष जबभी आता है कुरते मैं एक पेबंध और लग जाता है !
हद होगई भाई साहब …….
अब तो चरित्र की अति हो गई है !
इमानदारी भ्रस्ताचार से गर्भवती हो गई है !
लंगडे हाथियों को पटक रहें है!
अंधों के घर आईने लटक रहें है !!
मैं आँख वाला हूँ मरना चाहता हूँ देश के लिए बलिदान करना चाहता हूँ !......दस रूपये निकालिए.....
हमने कहा आप और किसी की जेब पर डाका पर डाका नहीं डाल सकते !
वो बोला डाल तो दूँ मगर आप की इज्जत का सवाल है और दस रूपये मैं ही जा रही है
इसीलिए भारत मैं क्रांति नहीं आ रही है !
पेसे का नाम सुनते ही कवि से सिन्धी हो गए चन्द्रमा से बिंदी हो गए !
आइना घर भूल आया हूँ अन्यथा आपका असली चहरा दिखा देता !
चूहे तक देश की सम्रधी को खा रहे है मैं आदमी हो कर भी खाना नहीं खा सकता !!
भाई साहब तिरछी नजर से न देखिये....
भूख हर दर्शन का घूँघट उघाड़ देती है !
रोटी सामने हो तो लाजवंती भी कपडे उतार देती है !!
फिर अपन तो पहले से ही नागा साधू है अपनी कुंठा ये है भाई साहब !
भूखे के बलिदान को सम्मान नहीं मिकता है !
खा पी के मरो तो अस्थि कलश निकलता है !!
जिस कौम को मिटने का अहसास नहीं होता !
उस कौम का दुनिया मैं इतिहास नहीं होता !!
हम ने कहा आप ठीक कहते है प्यारे आप शौक से शहीद कहलाना !
मगर अपना स्मारक खुद ही बनाकर जाना !!
गली का पागल कुत्ता १५ अगस्त के दिन जल चढायेगा !
प्लास्टर उतर गया तो कोई चुना लगाने भी नहीं आएगा !!
वो बोला ठीक है भाई साहब.............................
जी तो नहीं चाहता मगर बलिदान करना पड़ता है !
ज्ञानी को हमेशा मूर्ख के लिए मरना पड़ता है !!
एक रात सपने मैं फांसी का फंदा दिखा दूसरे दिन घरवाली ने हमारी आरती उतारी !
तीसरे दिन ठीक थाने के सामने हमने एक मुर्दे को गोली मारी !!
सारी दुनिया को दिखा
मगर जज साहब ने अपने फैसले मैं लिखा.............
चूँकि पुलिस का इतिहास बताता है
कोई कातिल कभी रंगे हाथ पकड मैं नहीं आता है !
क्योंकि कातिल रंगे हाथ पकडा गया है
इसीलिए बाइज्जत बरी किया गया है !!
भाई साहब हमने तंग आकर गंगा मैं छलांग लगाई !
तो पीछे से पण्डे ने टांग पकडली और प्रभाती सुनाई !!
सुबह-सुबह गंगा को प्रदुसित करता है नादान
खाली हाथ कहाँ चला जजमान
फोकट मैं मुक्ति- पायेगा ?
अबे मुर्दे तक को छोडा नहीं जिंदा बचाकर कैसे जायेगा ?
आप ही बताइए भाई साहब बलिदान के पथ पर कैसे आगे बढे !
शूली पर तो शहीदों का कब्जा है अपन जबरदस्ती क्यों चढ़े !!
एक बात पूछूँ भाई साहब जिस सरफिरे सम्राट ने इस शूली का सिलसला चलाया था !
क्या कभी उसको भी अपनी गर्दन का ख्याल आया था !!
कमबख्त ने इतना तो सोच लिया होता !
जुल्म के यदि पाँव होते तो कब का मंजिल पे पहुँच गया होता !!.........
No comments:
Post a Comment