Saturday, December 22, 2012

सरकारी व्यवस्था

पलक झपकते ही


हमारी अटेची साफ हो गई

झपकी खुली

तो सामने लिखा था-

इस स्टेशन पर

सफाई का

मुफ्त प्रबंध है!...............





इन्क्वायरी काउंटर पर

किसी को भी न पाकर

हमने प्रबंधक से कहा जाकर-

पूछताछ बाबू सीट पर नही है

उसे कहा ढूंढे?

जबाब मिला-

"पूछताछ काउंटर पर पूछे!..........





होनी थी हो गई

डाक व्यवस्था पर

जो फ़िल्म बनी थी

वह डाक मे ही

कही खो गई!.....................





सरकारी बस थी

सरकती न थी

बस, थी!..........................





रात

बारह बजे के बाद

आई एक

पुलिस वाले की आवाज

किसी ने सुना-जागते रहो

किसी ने सुना-भागते रहो!..............





सरकारी बस की

भीड़ मे

वह ऐसा फंस गया

कि फ़िर न निकला

वाही बस गया! ………………



भागते भुत कि लंगोटी भली

यह भी क्या कहावत है

जब भुत दिखता ही नही

तो उसे लंगोटी पहनने कि

क्या जरुरत है!





शेर शेरनी से नही डरता

क्योंकि

प्यार करता है

शादी नही करता

आदमी ऑरत से डरता है

क्योंकि

प्यार नही सिर्फ़ शादी करता है!





जो खांमखा पाँव छूता है

उससे बचो

क्योंकि

वो आदमी नही जूता है!







किसी के पास एलोपैथी

किसी के पास होम्योपैथी

किसी के पास नेचरोपैथी

बीमार को चाहिए थी सिम्पैथी!



डाक्टर ने

मरीज़ को

टेबुल पर लिटाया

बिना वस्त्र हटाए ही

इन्जैक्शन लगाया।

जब मरीज़ ने

सुई न चुभने

दर्द न होने की

शिकायत की

तो डॉक्टर ने

ज़ोर का कहकहा लगाया

बोला, ‘‘हमारे टीके से

दर्द का होना

हमारी सुई से

मरीज़ का रोना

इतना आसान नहीं है,

ये डाक्टर झटका का

क्लीनिक है,

किसी नौसिखिए की

दुकान नहीं है।’’



आश्वस्त होकर

मरीज़ ने

पैसे देने के लिए

जैसे ही पर्स खोला

उसके चेहरे पर

मुर्दनी छा गई

इन्जैक्शन नोटों में घुस गया, और

दवा पर्स में आ गई।



इसी प्रकार

सरकारी अनुदान की राशि

अपना अलग

चमत्कार दिखलाती है।

जिसे

ग़रीब की धमनियों में पहुंचना चाहिए

वो इन्जैक्शन की

दवाई की तरह

दलालों के पर्स

में पहुंच जाती है।

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