प्रष्ठ भूमि-दो नेता थे एक मांगीलाल दूसरा मोतीलाल!दोनों एक ही जगह से ताल्लुक रखते थे!दोनों ने एक ही पार्टी से चुनाव लड़ने के लिए पर्चा भरा! मगर टिकट एक को ही मिलना स्वाभाविक था और मोतीलाल को टिकट मिल गया तो मांगीलाल ने पार्टी कार्यकर्ता के नाते मोतीलाल का चुनाव मैं सहयोग किया! जब चुनाव का परिणाम आया तो मोतीलाल की जमानत ही जब्त हो गयी! अब अवसर था उस सभा को संबोधित करने का जो चुनाव के बाद धन्यवाद सभा के रूप मैं आयोजित की गई थी! मंच पर जीते हुए तथा हारे हुए दोनों पक्ष के नेता मोजूद थे और सामने थी वो जनता जिसने हार जीत का फ़ैसला तय किया था! सभा के दौरान मंच पर बैठे मांगीलाल ने मोतीलाल के चुटकी ली और बोला गुरु आज मौका है चुको मत ये वही जनता है जिसने आपके साथ दगा किया! तो देखिये एक हारा हुआ नेता उस मंच पर माइक पकड़कर जनता को भाषण देता है! जिसका शीर्षक है
मांगीलाल और मैंने..........
लोकतंत्र के लुच्चो- दगाबाज-तुच्चो :-
ब्रहामन क्षेत्रीय वेश्य हरिजन
जब हम हार गए तो काय का इलेक्शन
जिस देश की जनता हो तुम जैसी
वहाँ मक्कारी की जरुरत कैसी
भीतर घातियो जयचन्द के नातियों :-
तुमने अंगुरी पीके अंगूठा दिखाया है
आज मुझको नही मिनी महात्मा गांधी को हराया है
हमारी हार को बी. बी. सी. लंदन से ब्रोडकास्ट करवाई
और ये ख़बर आज तक अखबार मैं नही आई
देश को आजादी किसने दिलवाई....मांगीलाल और मैंने............
गुलम्टों :-
गुलाम से मतदाता बने तो बुद्धि चकराई
हमारे चहरे पर सुखा तुम्हारे चहरे मलाई
पशु मिले के पोस्टरों :-भूल गए वो दिन
जब जंगल मैं उछल कूद करते थे
आसमान धरती पे धरते थे
अरे लंगोटी लपेटना भी ढंग से नही आया
तुमको बन्दर से आदमी किसने बनाया.....मांगीलाल और मैंने...........
अंधेरे की अवैध संतानों :-
हमने तुम्हे नई रोशनी मैं खड़ा किया
और हमही को अंधेरे मैं चुना लगा दिया
दुश्मन को वोट और हमको टा-टा
एक गाल पे चुम्मन और एक गाल पे चांटा
बहुत अच्छे-बहुत अच्छे अब खालो रबड़ी के लच्छे
ये मुंह और रसगुल्ले केसरिया दूध के कुल्ले
ऊपर से गांजे चिलम भगवान् कसम
तुम को ये दिन किसने दिखाए.....मांगीलाल और मैंने.........
कायरता के कुकरमुत्तो :-
तुमसे तो बहत्तर तुम्हारा बाप था
पिछला चुनाव उसीने जितवाया
अरे पेटी लेके ऐसा भागा के
आज तक वापस घर नही आया
हमने भी एडी से चोटी तक जोर लगाया
उसको शिखण्डी पुरस्कार किसने दिलाया.....मांगीलाल और मैंने……
गीदड़ के आखरी अवतारों :-
ये राजनीति तुम्हारे समझ मैं क्यों नही आती है
सत्ता किसी को जनता हमेशा सताई जाती है
खून हमेशा गरीबों का बहा
ये चार जानो के सामने किसने कहा....मांगीलाल और मैंने.......
नरकूँडो :-
भूल गए वो दिन जब अपमान का कड़वा घुट पी रहे थे
पशुओ से बत्तर जिन्दगी जी रहे थे
फ़िर भी नींद ले रहे थे प्यारी-प्यारी
और तुम्हारे स्वाभिमान को दुलत्ती किसने मारी...मांगीलाल और मैंने...........
झाँसी की रानी कौन था पुरा पंडाल मौन था
एक मतदाता बोला झाँसी की रानी था नही थी
नेता फौरन घूमकर बोला तुमको ये बुद्धि किसने दी......मांगीलाल और मैंने.........
कलिदास के क्ल्लुओ :-
कभी खोला है इतिहास का वो सुनहरा पन्ना
जब भगतसिह ने एसम्बली मैं बम्ब फोड़ा सारे देश को जगाया
अरे हमारे शरीर मैं भी ऐसा करंट आया
देश पर मिटने के लिए एक दर्जन बच्चे किसने पैदा किए....मांगीलाल और मैंने........
कामदेव की कार्बन कॉपियों :-
क्या तुम और क्या तुम्हारी ओकात
अरे जिस दिन थी तुम्हारी सुहागरात
और अंधेरे मैं दिखती नही थी तुम्हारी लुगाई
तब बिजली की बत्ती किसने जलाई.....मांगीलाल और मैंने.............
रेगिस्थान के ठुन्ठो :-
सूखे का मजा तुमने चखा
और संतोसी माता का व्रत हमारी घर वाली ने रखा
एक उपवास मैं जिन्दगी भरी हो गई
सुबह तक रामदुलारी थी शाम तक रामप्यारी हो गई
चली गई सारी जवानी लेके
और बुद्धापे मैं ये दिन किसने देखे......मांगीलाल और मैंने.........
दुनिया के सारे देश तरक्की कर रहे थे
उनके नाज नखरे हमको अखर रहे थे
हमने भी ऐसा डाव मारा के सब पे भरी होगये
सालो से इतना कर्जा लिया के वो ख़ुद भिखारी होगये
पिट गया सब का दिवाला
और तरक्की का नया फार्मूला किसने निकला.......मांगीलाल और मैंने......
और मांगीलाल तूं तुने क्या किया
जो कुछ किया वो तो मैंने किया
खटिया तो तेरी भी खड़ी हो गई है बुल्ले
जाते-जाते एक शेर तू भी सुनले
तुझसे कोई गिला नही है आस्तीन के सौंप
हम से ही तो खून के घूंट पिलाते नहीं बना !!!
मांगीलाल और मैंने..........
लोकतंत्र के लुच्चो- दगाबाज-तुच्चो :-
ब्रहामन क्षेत्रीय वेश्य हरिजन
जब हम हार गए तो काय का इलेक्शन
जिस देश की जनता हो तुम जैसी
वहाँ मक्कारी की जरुरत कैसी
भीतर घातियो जयचन्द के नातियों :-
तुमने अंगुरी पीके अंगूठा दिखाया है
आज मुझको नही मिनी महात्मा गांधी को हराया है
हमारी हार को बी. बी. सी. लंदन से ब्रोडकास्ट करवाई
और ये ख़बर आज तक अखबार मैं नही आई
देश को आजादी किसने दिलवाई....मांगीलाल और मैंने............
गुलम्टों :-
गुलाम से मतदाता बने तो बुद्धि चकराई
हमारे चहरे पर सुखा तुम्हारे चहरे मलाई
पशु मिले के पोस्टरों :-भूल गए वो दिन
जब जंगल मैं उछल कूद करते थे
आसमान धरती पे धरते थे
अरे लंगोटी लपेटना भी ढंग से नही आया
तुमको बन्दर से आदमी किसने बनाया.....मांगीलाल और मैंने...........
अंधेरे की अवैध संतानों :-
हमने तुम्हे नई रोशनी मैं खड़ा किया
और हमही को अंधेरे मैं चुना लगा दिया
दुश्मन को वोट और हमको टा-टा
एक गाल पे चुम्मन और एक गाल पे चांटा
बहुत अच्छे-बहुत अच्छे अब खालो रबड़ी के लच्छे
ये मुंह और रसगुल्ले केसरिया दूध के कुल्ले
ऊपर से गांजे चिलम भगवान् कसम
तुम को ये दिन किसने दिखाए.....मांगीलाल और मैंने.........
कायरता के कुकरमुत्तो :-
तुमसे तो बहत्तर तुम्हारा बाप था
पिछला चुनाव उसीने जितवाया
अरे पेटी लेके ऐसा भागा के
आज तक वापस घर नही आया
हमने भी एडी से चोटी तक जोर लगाया
उसको शिखण्डी पुरस्कार किसने दिलाया.....मांगीलाल और मैंने……
गीदड़ के आखरी अवतारों :-
ये राजनीति तुम्हारे समझ मैं क्यों नही आती है
सत्ता किसी को जनता हमेशा सताई जाती है
खून हमेशा गरीबों का बहा
ये चार जानो के सामने किसने कहा....मांगीलाल और मैंने.......
नरकूँडो :-
भूल गए वो दिन जब अपमान का कड़वा घुट पी रहे थे
पशुओ से बत्तर जिन्दगी जी रहे थे
फ़िर भी नींद ले रहे थे प्यारी-प्यारी
और तुम्हारे स्वाभिमान को दुलत्ती किसने मारी...मांगीलाल और मैंने...........
झाँसी की रानी कौन था पुरा पंडाल मौन था
एक मतदाता बोला झाँसी की रानी था नही थी
नेता फौरन घूमकर बोला तुमको ये बुद्धि किसने दी......मांगीलाल और मैंने.........
कलिदास के क्ल्लुओ :-
कभी खोला है इतिहास का वो सुनहरा पन्ना
जब भगतसिह ने एसम्बली मैं बम्ब फोड़ा सारे देश को जगाया
अरे हमारे शरीर मैं भी ऐसा करंट आया
देश पर मिटने के लिए एक दर्जन बच्चे किसने पैदा किए....मांगीलाल और मैंने........
कामदेव की कार्बन कॉपियों :-
क्या तुम और क्या तुम्हारी ओकात
अरे जिस दिन थी तुम्हारी सुहागरात
और अंधेरे मैं दिखती नही थी तुम्हारी लुगाई
तब बिजली की बत्ती किसने जलाई.....मांगीलाल और मैंने.............
रेगिस्थान के ठुन्ठो :-
सूखे का मजा तुमने चखा
और संतोसी माता का व्रत हमारी घर वाली ने रखा
एक उपवास मैं जिन्दगी भरी हो गई
सुबह तक रामदुलारी थी शाम तक रामप्यारी हो गई
चली गई सारी जवानी लेके
और बुद्धापे मैं ये दिन किसने देखे......मांगीलाल और मैंने.........
दुनिया के सारे देश तरक्की कर रहे थे
उनके नाज नखरे हमको अखर रहे थे
हमने भी ऐसा डाव मारा के सब पे भरी होगये
सालो से इतना कर्जा लिया के वो ख़ुद भिखारी होगये
पिट गया सब का दिवाला
और तरक्की का नया फार्मूला किसने निकला.......मांगीलाल और मैंने......
और मांगीलाल तूं तुने क्या किया
जो कुछ किया वो तो मैंने किया
खटिया तो तेरी भी खड़ी हो गई है बुल्ले
जाते-जाते एक शेर तू भी सुनले
तुझसे कोई गिला नही है आस्तीन के सौंप
हम से ही तो खून के घूंट पिलाते नहीं बना !!!
1 comment:
kavita ke sath manikji behad typical style
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