Saturday, April 19, 2008

लुगाई-रो-कागद

हे प्राणघात जी,
घणे हेत सूँ प्रीत प्रेम सूँ आपरे चरण लकड़ मैं प्रेम लाडली रा शीश झुकार पग पकड़ मानना!
हे साहब जी,
गौत री मौत,आटे री लौथ, जागती जौत, थौथ ही थौथ,सुहाग री महंदी, विधवा रा श्रंगार, गले रा हार, छाती रा भार,मायली मार,लुगडी रा तार, मुनकी रा भा जी काल रा छोरा,खेड़ापे रा स्यामी म्हारा जामी!
दुखती आँख मैं गीड ज्यूँ रात दिन आपरी ओलूं घंनी आवे नींद नी आवे है!
हे भरतार जी,
अजकाले तो म्हारे उन्धी ही उन्धी जचे है जाणु भाटेऊ सासु सुसरे रो नाक भांग दूँ, करम फोड़ दूँ, टांग तोड़ दूँ पण इसो विचार पल दो पल ही रेवे है आदत पड़गी तो आपने ही खतरों है!
हे प्रीतम जी,
अचानक कालजे मैं धपड़को सो उठ ज्यावे है छाती मैं लाय सीक लाग ज्यावे आंख्याँ मैं तरड़- तरड़ आंसू आवे जाणे सावन झड़ लगी है एकदम मन मैं इसी जचे जाणु आप संसार मैं कोनी!
बिजली कड़के, छाती धडके, आंख्या फडके जणे मन मार घर मैं जार उन्धी पडके सो ज्याऊ थाने रोउ!अशुभ समाचार सूँ डरती डाकिये ने देखर आडो ढक दूँ कांइठा आपरे मरण रो कागज पत्र पकडाइदे!
हे परमेश्वर जी,
कागज़ बांचता पाण बेगा आज्यो जीव नी लगे सुखर उबालियोड़ी सांगरी सी हुगी हाथां रा कडूल्या आंगली मैं नी आवे नखां मैं ही फस ज्यावे धान री तो बास आवे- टुकडों ही नी भावे कितोई खाऊ धापुं ही कोनी!
हे धणी जी,
कबूतर - कबूतरी ने गुटर-गु गुटर-गु करता देख मने थांरी ओलूं घणी आई धणी दुःख पाई रोई-सोई पण नींद नी आई थे म्हारे खने होता म्हे थारे ओली दोली फिरती गुटर-गु गुटर-गु करती थे म्हारे चुन्चां मरता म्हे थांरे चुन्चां मारती
हे चरनदास जी,
सारी रात अंख्या मैं बात नी पड्यो, जागी भागी रसोई मैं गई सेर एक आते रो सिरों बणार खायो जणे जार आँख लगी दूजे दिन तीन बज्याँ जगी, जगी कांइ जगायदी गई मरी खाई पाडोसन आई बोली थारा सासु-सुसरा भूत बणग्या जापतो करा!
पत्तो पल्टियो आगे पढियो इं भांत रा रोजीना खोटा खोटा सपना आवे, ठाला भुला मने डरावे, औ सपनो काल झांझरके आयो! बेगा आज्यो मोड़ो मत करज्यो जे थे नी आओला सपनो साचो हुज्यवेला टाबर रुलज्यावेला!!

आप रे प्राणा री प्यासी
पताल फुर्र ............

1 comment:

Someshwar said...

saab bahut hi shaaandaar kaviita likhi ho saa.

aap ri aa kavita mhare mitro ne scrap kar riyo hoon saa.(aap ro html tag re haathe)