Saturday, April 26, 2008

बुलंद हौसले

लड़ता हुआ आंधियो से जो तुम्हे मिल जायेगा,
पूछोगे उस दिए से तों वो मेरा पता बतायेगा !


घर से चला हूँ मकसद मंजिल है जहन मैं,
मुसीबत को कुचलता हूँ रास्ता बनता जाता है!


बुलंद हौसले होते है जिनके मंजिले कदम चूमती है,
बुजदिलो का तो इस दुनिया मैं जीना ही बेकार है !


क्यूँ बेचते हो अपना ईमान तन मन वतन को,
क्या करेगा वो हासिल जो ख़ुद बिकने को तैयार है!


जीवन से तंग हो तो फ़िर जीते क्यों हो ,

जान प्यारी भी नहीं जान से जाते भी नहीं!

1 comment:

mehek said...

bahut bahut sundar kavita,asha se bhari.