Wednesday, April 23, 2008

दारु दान जी

आ मन भरमावे राजा राजवाडा की शान सी,
पण हुवे बडो अफ़सोस उतरयाँ दारु दान जी !


चूल्हा चौक चौबारा उठग्या
जैबां माथे हाथे डाका पड़ग्या
अरे राजा रा राजवाडा लुटग्या
ओ से करमा को दोष पण चाईजे आतो रोज
हुवे बडो अफ़सोस उतरयाँ दारु दान जी !.......



कल्लाळी आ कामण करगी
घर आळी री सौतण बणगी
लत काँई पड़गी चित मैं चढ़गी
आ तो भख ले वे रोज मदवा उड़ावे मौज
हुवे बडो अफ़सोस उतरयाँ दारु दान जी !........



कल्लाळी रे खातर करे दन्द-रा-फंद
राषण को तो फाको नई करो इको प्रबंद
घर का जाणे मरगयो आप करो "आनंद",
मदवा पड्या मदहोश ऊपर कुत्ता रा खोज
हुवे बडो अफ़सोस उतरयाँ दारु दान जी !.........

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